Tuesday, 8 March 2016

और.... अब.... श्री श्री की बारी



श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ़ लिविंग द्वारा आयोजित विश्व सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन 11 मार्च से 13 मार्च तक दिल्ली में पूर्वी यमुना किनारे किया जा रहा है. इसका आयोजन आर्ट ऑफ लिविंग के 35 वर्ष पूरे होने उपलक्ष में किया जा रहा है और वास्तव में आर्ट ऑफ लिविंग और इसके अनुयायियों के लिए उत्सव  जैसा है . आर्ट ऑफ लिविंग, लोगों को शांत और खुश होकर जीने की कला सिखाता है, तनाव को दूर करता है, और  व्यक्ति खुशहाल रह सकता है. चूँकि  इन सबसे व्यक्ति की  उत्पादकता भी बढती  है इसलिए लगभग  सभी बड़े कॉर्पोरेट  अपने कर्मचारियों को आर्ट ऑफ लिविंग के कोर्स कराते है. स्वाभाविक है आर्ट ऑफ लिविंग के अनुयायियों की एक बहुत बड़ी संख्या है. विश्व के लगभग हर बड़े शहर में आर्ट ऑफ़ लिविंग के आयोजन हए हैं.  हिंदुस्तान का एक बहुत बड़ा समूह आर्ट ऑफ लिविंग से प्रशिक्षित और प्रभावित है. अब जब  आयोजन का समय बहुत नजदीक आ गया है, कुछ पर्यावरण विद और संस्थाएं इस आयोजन के विरोध में खड़े हो गए हैं. मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में  चल रहा है. आज भी इसकी सुनवाई होगी. पक्ष और विपक्ष में दलीलें होगी लेकिन अहम् प्रश्न  है कि क्या यह आयोजन हो सकेगा ?

इस आयोजन का उद्देश चाहे जो भी हो लेकिन कम से कम राष्ट्र और मानवता के विरुद्ध तो नहीं हो सकता. इस आयोजन में कई देशों के कलाकार भाग लेंगे और भारत के विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों प्रस्तुत करने के अलावा विभिन्न समुदायों और  विभिन्न धर्मों के लोग मिलेंगे बैठेंगे और विश्व शांति के लिए रास्ता खोजेंगे. कुल मिलाकर देखा जाए तो यह ऐसा दुर्लभ आयोजन है जो भारत भूमि पर होगा और भारतवासियों को उपलब्ध होगा. हम शामिल हो पाएं या नहीं पर टीवी चैनलों के माध्यम से  कम-से-कम सभी भारतवासियों को  इस का लाभ मिल सकता  हैं. आजकल भारत में प्रचलन  हो गया है हर अच्छे काम का विरोध करना. और उस के पक्ष विपक्ष में पूरे हिंदुस्तान को बांटने की कोशिश करना. गनीमत यह है कि यह मामला सिर्फ पर्यावरण से जोड़ा गया है इसमें  धार्मिक मानसिकता का समावेश नहीं किया गया है . यह अच्छी बात है कि पर्यावरण के लिए पूरा विश्व सजग  है और हम भी उस में सहयोग कर रहे हैं लेकिन कुछ पर्यावरण विद और  उनके कार्यकर्ता ऐसा काम करते हैं जिससे जनमानस के बहुत बड़े वर्ग में कसमसाहट होती है. सभी जानते हैं पर्यावरण विश्व की समस्या है और बहुत बड़ी समस्या है लेकिन इस समस्या को खड़ा करने में कम-से-कम भारत का बहुत बड़ा योगदान नहीं है क्योंकि जो कार्य विकसित देशो ने कम समय में कर दिया है वह  भारत कम-से-कम अगले 50 साल में भी नहीं कर सकता है. हमें देखना होगा कि इस तरह के आयोजन से पर्यावरण का कैसा और कितना नुकसान हो जाता है और जिस प्रकार के तर्क और कुतर्क इस आयोजन के विरोध में दिये  जा रहे हैं साधारण जनमानस को समझ में नहीं आ सकते . अमेरिका सहित  विश्व के किसी भी देश में अगर इस तरह का आयोजन होता तो उस देश के लिए गौरव की बात होती लेकिन हिंदुस्तान में हम लोग अभ्यस्त हो गए है कि  हर अच्छे काम का विरोध होता है. यहां तक  बड़े तीज त्योहारों का भी विरोध होता है दिवाली पर पटाखे ना छोड़ने की अपील होती है. कितने शक्ति के पटाखे चलाए जाएं निर्णय किये जाते हैं इस पर रोक लगाई जाती है. होली पर  पानी कितने समय उपलब्ध हो यह निश्चित किया जाता है. होली जलाने में लकड़ी और आदि का जो प्रयोग किया जाता है इस पर भी तमाम विरोध होता  है  पर्यावरण  के नाम पर. बहुत बड़े यज्ञ और हवन के  विरोध में भी  आवाजे आती  हैं.

शायद सभी जानते है भारत की जीवन पद्धति आद्र पद्धति है और आदिकाल से सभी आयोजन नदियों, जलाशयों और सरोवरों  के किनारे होते आये हैं . कुम्भ, अर्ध कुम्भ सहित तमाम  आयोजन नदियों के किनारे होते  है और करोड़ों की संख्या में लोग भाग लेते हैं. आज अगर इस तरह के आयोजन के विरुद्ध आवाज उठाई जा रही है तो कल कुंभ और अर्ध कुंभ के आयोजन पर भी प्रतिबंध प्रतिबंध लगाया जा सकता है. हो सकता है कि सरकारी औपचारिक्ताये पूरी  न हुयी हों पर भारत के एक बड़े वर्ग को इससे वंचित नहीं किया जाना  चाहिए.
आशा है ये आयोजन जरूर होगा . 
*******************

शिव प्रकाश मिश्रा 

Friday, 4 March 2016

कन्हैया की रिहाई ....... बधाई ..उनके शुभ चिंतकों को

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के पदाधिकारी कन्हैया कुमार को कल दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रिहा कर दिया गया. हालाकि  दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में ऐसी  बहुत सारी  शर्तें हैं जिनसे JNU में जो कुछ हुआ उसके प्रति अच्छा सन्देश नहीं है. ये सर्व विदित है कि कैसे JNU  को राष्ट्र विरोधी तत्वो का अड्डा बनाया गया और कैसे वहां पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियां चलाई जाती है और कैसे वहां पर  देश के बहुत संख्यक समुदाय के प्रति कुत्सित भावनाएं निकाली जाती हैं . इन सब के पीछे एक सुनियोजित अभियान है और इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर  और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी धन उपलब्ध कराया जाता है. अंतरिम जमानत आदेश की शर्तों में कन्हैया कुमार को किसी भी देश विरोधी अभियान में शामिल ना होना, किसी भी ऐसी चीजों से अलग रहना  जिससे देश की छवि प्रभावित होती है, देश की अखंडता को धक्का पहुंचता है. लेकिन इस जमानत को एक बहुत बड़ी विजय के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है .

  रिहाई के बाद कन्हैया कुमार के लिए  JNU में उसी रात लगभग 11:00 बजे एक सभा का आयोजन किया गया जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लगभग हर चैनेल ने सीधे प्रसारित किया. जिन लोगों ने ये  सीधा प्रसारण देखा और कन्हैया कुमार द्वारा संबोधन और उस में कही गई बातों का सुना, उन लोगों को इस बात का एहसास जरूर हुआ होगा कि उसके बोलने की स्टाइल और डायलोग बहुत ही  अच्छे हैं, पूरा भाषण किसी मंझे  हुए राजनेता से कम नहीं था . भाषण को बहुत ही सावधानी  से लिखा गया था और मुख्य निशाना केंद्र व् सरकार नरेंद्र मोदी थे . यह कहना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि  पूरे भाषण में कन्हैया कुमार ने कई राजनीतिक दलों का और कई  नेताओं का नाम लेकर उनके प्रति आभार व्यक्त किया और प्रशंसा की जिन्होंने उनका साथ दिया. ये  दर्शाता है कि यह पटकथा कहीं और लिखी गयी . कन्हैया कुमार के अतीत को अगर देखा जाए तो ऐसा नहीं लगता कि वह किसी मंझे  हुए नेता की  तरह सधा  हुआ भाषण देने की कला जानते हैं.  और तो और, भाषण के अंत में उसी तरह की  नारेबाजी की गई.... आजादी.... आजादी जैसे कि उमर खालिद ने हिंदुस्तान से  आजादी की  बात की थी. शायद इसका उद्देश पूरे देश को संदेश देना होगा की उस दिन अफजल गुरु की बर्षी पर भी  इसी तरह के भाषण दिए गए थे  और जो भी वीडियो पुलिस के समक्ष प्रस्तुत किये गए या  मीडिया में दिखाए गए गए वह सही नहीं थे. यही काफी कुछ नियोजित लगता है.

कन्हैया कुमार की जेल के दौरान  उनके परिवारी जनो द्वारा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करना और कन्हैया ने  जो भी किया  उस पर गर्व किया . भाषण में तमाम लोगों पर नाम कटाक्ष किया गया और एलान किया गया कि आजादी की जंग चलती रहेगी. स्वाभाविक है आजादी की जंग का मतलब मोदी सरकार से आज़ादी. ये शुद्ध राजनीति है और इसलिए जो पूरा ड्रामा शुरु हुआ और उसे  जो मोड़ दिया गया वह आगामी चुनाओं को ध्यान में रखते हुए  किया गया है.


भारत में पिछले  कुछ महीनों में हुए आन्दोलनों पर  अगर सिलसिले बार गौर किया जाए तो आप पाएंगे कितना कुछ बिलकुल इवेंट मैनेजमेंट की तरह किया जा रहा है . फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया पुणे में छात्रों का प्रदर्शन होता है, कथित बौद्धिक लेखक वर्ग असहिष्णुता के नाम पर अपना पुरस्कार वापस करता है और तब  तक चलता रहता है जब तक बिहार के चुनाव संपन्न नहीं हो जाते,  इसी बीच में रोहित वेमिला का मामला आता है, बीफ का मामला गर्माता है . इसके बाद मैं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का नंबर आता है और अफजल गुरु के फांसी के दिन को  शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, उसकी प्रशंसा की जाती है. अफजल गुरु के पक्ष में स्वयं  उमर खालिद और एक विशेष समुदाय संबंध रखने वाले कई नेता मीडिया बहस में अफजल गुरु और कई ऐसे लोगों के पक्ष में बयान देते हैं.

इस बात में किसी को भी कोई संदेह नहीं कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में राष्ट्र विरोधी नारे लगाए गए . अखिलेश गुरु के समर्थन में नारे लगाए गए और बहुत से ऐसे नारे लगाए गए कि कोई भी राष्ट्र भक्त और राष्ट्र हित में सोचने वाला व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर सकता है. जब इस मामले को मीडिया में उछाल दिया गया तो तथाकथित बौद्धिक वर्ग सामने आ गया इसमें राजनैतिक दल भी थे और कई गणमान्य व्यक्ति भी. पूरे मामले को ऐसा मोड़ दे दिया गया जैसे की राष्ट्र और राष्ट्र विरोध की भावना ना होकर केंद्र सरकार और छात्र के बीच का मामला है. कन्हैया कुमार को जेल  ले जाते समय  धक्का मुक्की को उन वकीलों के लिए ऐसा पेश किया गया जैसे उनका कृत्य राष्ट्रद्रोह से भी भयंकर है. इस बीच उमर खालिद और उसके अन्य साथी  भूमिगत हो जाते हैं और जब पूरा माहौल उन के पक्ष में बन जाता है, कई राष्ट्रीय नेता और अंतरराष्ट्रीय हस्तियां  उन के पक्ष में खड़े हो जाते हैं तो अचानक प्रगट हो जाते हैं. दिल्ली सरकार जिसके पास पुलिस का कंट्रोल  नहीं है, कानून व्यवस्था का भी दायित्व  नहीं है,  मजिस्ट्रेट जांच का आदेश देती है और उस जांच में यह पाया जाता है कि जो वीडियो पुलिस को दिए गए और जिन वीडियो के आधार पर भी कार्रवाई की जा रही उनके साथ छेड़छाड़ की गयी थी. इन सबके बीच कई राजनीतिक दलों के नेता कैम्पस  जाते हैं और सभी छात्रों के समर्थन में खड़े हो जाते हैं . कई राज्यों के मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों से बयान देते हैं. अब कन्हैया बामपंथियो, कांग्रेस और आप के लिए चुनाव प्रचार करेंगे ...

विषय बहुत गंभीर है और इसको उतनी ही गंभीरता से हल करने की जरूरत है. देशद्रोहियों के साथ,  देश के विरुद्ध बात करने वालों के साथ, देशद्रोहियों का साथ देने वालों के साथ, बहुत ही सख्ती से पेश आने की जरूरत है लेकिन देश के पालनहार कर्णधार राजनैतिक  स्वार्थ बस .....देश हितो के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं . राजनीतिक स्वार्थ आज देश तो बहुत बड़ा हो गया है. पूरी दुनियां देख रही है .. भारत कैसा महान है ? और कितना महान है ?


******************

शिव प्रकाश मिश्रा 



Thursday, 3 March 2016

कर्मचारी भविष्य निधि .....आयकर.....या सजा ?

बजट में वित्त मंत्री द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि पर लगाए जाने वाला टेक्स साधारण टैक्स नहीं है यह कर्मचारियों के लिए जिन्होंने 30 - 35 साल की सेवा अवधि पूरी कर ली है और निकट भविष्य में सेवानिवृति होने वाले हैं, बहुत बड़ी सजा है. यह ज्यादातर कर्मचारियों की राय है.  भविष्य निधि एक  लंबी अवधि की संचय योजना है और उसका उद्देश्य सेवा निवृत्ति के समय एक मुस्त राशि प्रदान करना है ताकि वे अपनी जिम्मेदारियों का वहन कर सकें.  वित्त सचिव और वित्त  राज्य मंत्री के बयानों और स्पष्टीकरण से ऐसा मालूम हुआ है कि  संभवत: ब्याज की 60% भाग पर टैक्स लगेगा.

 टैक्स का प्रावधान  करने वाले केंद्र सरकार के उच्च अधिकारियों को शायद ये  नहीं मालूम है कि  सेवा मुक्त होने पर भविष्य निधि की राशि जो कर्मचारी को मिलती है उस में आधे से अधिक हिस्सा सिर्फ ब्याज का होता है और अगर ब्याज की 60% राशि पर भी टैक्स लगाया जाता है तो यह बहुत अधिक होगा लगभग. अगर कोई कर्मचारी पेंशन सिस्टम में निवेश करने की बजाय टैक्स देना पसंद करें, तो अनुमान है कि  वह व्यक्ति अपने भविष्य निधि का लगभग पांचवा (१८-२०%) हिस्सा सिर्फ टैक्स के रुप में गवां देगा . अगर यह पैसा  पेंशन योजना में  लगाया जाता है जो आज की परस्थितयों में  बहुत अच्छा सुझाव नहीं है, क्योंकि एक तो ज्यादातर योजनाएं भारत में बहुत आकर्षक लाभ नहीं दे रहीं  हैं और दूसरे इन  योजनाओं से निश्चित समय बाद जो पैसा निकालने दिया जाता है तो उन पर आयकर लगता है। 

 पेंशन योजना की  तुलना में अगर इस राशि को कहीं अन्यत्र निवेश किया जाता है तो उसके लाभ काफी जादा है. स्पष्ट है कि जो  कर्मचारी रिटायर होते हैं उनके पास भविष्य निधि के फंड के अलावा बहुत सीमित विकल्प होते हैं और खास तौर से ऐसे लोग जो अपनी जिम्मेदारियों के कारण अपने सेवाकाल में ऐसा कुछ नहीं कर पाते हैं जिसके  सपने उनके दिल में होते हैं. ये लोग सेवा मुक्त होने  के बाद ऐसा क्या करेंगे ? कार खरीदेंगे.. मकान खरीदेंगे...बच्चों की शादी विवाह करेंगे...  जमीन खरीदेंगे या जाकर गांव कस्बे या शहर  में बसेगे. उनके लिए यह प्रस्ताव बहुत ही मुसीबत देने वाले हैं . 

वास्तव में यह टैक्स नहीं... सजा है और सरकार को इस से बचना चाहिए . इस तरह का प्रावधान एक तो अनायास नहीं किया जा सकता और दूसरे ऐसे लोग अपने पूरे सेवाकाल में तमाम कठनाईयां सहने के बाद अपने भविष्य निधि को हाथ भी नहीं लगाया और भविष्य के लिए सुरक्षित रखा. मनोवैज्ञानिक रुप से भी एक अच्छा कारण सरकार के लिए नहीं है.. वित्त मंत्रालय से जुड़े तमाम अधिकारियों ने कहा है इस योजना का उद्देश भविष्य निधि पर टैक्स लगा कर  सरकार के लिए पैसे जुटाना नहीं है बल्कि सरकार चाहती है की लोगों को सामाजिक सुरक्षा मिले. अगर सरकार की यह बात स्वीकार भी की जाए तो भी इसे तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता. इस तरह की योजना अगर लागू करनी है तो नए कर्मचारियों के लिए लागू करनी चाहिए और जो कर्मचारी अगले कुछ सालों में रिटायर होने वाले हैं उन पर यह योजना थोपी नहीं जानी चाहिए.  इस तरह की योजनाएं बनाने वाले मुख्यता केंद्र सरकार के वह बड़े अधिकारी है जिनके पास अच्छी संपत्ति है और जिन्होंने देश विदेश घूमकर सामाजिक सुरक्षा की विभिन्न  योजनाएं देखी हैं जिनका भारत में काम करने वाले छोटे कर्मचारियों की रोजाना जिंदगी और समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है. ये  वह अधिकारी हैं जिनको इतनी पेंशन मिलती है जो शायद प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के निकायों में काम करने वाले बड़े अधिकारियों की सैलरी से भी ज्यादा होती है. स्वाभाविक है वह शायद इस योजना को समझ नहीं पाएंगे . 

अच्छा  होगा यदि सेवा मुक्त होने वाले कर्मचारी अपना पैसा कैसे इस्तेमाल करेंगे ? कहां लगाएंगे ? इसका फैसला उनके ऊपर छोड़ देना चाहिए. इस तरह की जो सोशल सिक्योरिटी की योजनाएं लागू की जानी  है वह कर्मचारियों के करियर की शुरुआत में लगाई जानी चाहिए. कम से कम भी सेवा मुक्त होने वाले कर्मचारियों पर यह चीजे नहीं थोपी  जानी चाहिए.  
इस प्रावधान को तुरंत वापस ले लेना चाहिए.


***************************************

               -  शिव प्रकाश मिश्रा 

***************************************

Tuesday, 23 February 2016

हिंदुस्तान जवानों के साथ ....? या राष्ट्र द्रोहियों के साथ ..?


आज जम्मू कश्मीर के एक आतंकवादी अभियान में सेना के 2 अधिकारियों सहित कुल 5 जवान शहीद हो गए. इसका कारण क्या है ? आतंकवाद के विरुद्ध बात नहीं हो रही है. बात चल रही है  तो जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के उन  छात्रों की जिन्हीने  भारत की बर्बादी तक जंग लड़ने की बात कही थी ....और जम्मू कश्मीर की आजादी तक जंग की  बात की  थी . वे छात्र  अभी तक पकड़े नहीं जा सके हैं . कई राजनीतिक दलों के लोग उनका साथ दे रहे हैं . इन राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के साथ खड़े हुए हैं. इनका मकसद क्या है ? इसका मतलब क्या है ? पहली बार  केंद्र में ऐसी सरकार है जो चाहे और जो भी न कर पा रही हो पर बहुसंख्यक वर्ग और देशभक्त लोगो में आशा का संचार कर रही है. जिससे पाकिस्तान समर्थक और देश के विरुद्ध काम करने कई गैर सरकारी संगठन सर्कार के विरुद्ध खड़े हो गए है. कभी अवार्ड वापसी, कभी असहिष्णुता, कभी FTII आन्दोलन, कभी IIT मद्रास, कभी हैदराबाद विश्वविद्यालय तो कभी JNU जैसी घटनाओं द्वारा न केवल सरकार  के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं बल्कि ये देश का बेडा गर्क कर रहे हैं .

 क्या इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ मोदी का विरोध करना और उनके विरुद्ध एक संयुक्त प्लेटफार्म खड़ा करना है ? ताकि आगे आने वाले चुनावों में  एक बेहतर विकल्प साबित कर सके और अल्पसंख्यकों के बोट  भी पा  सकें . कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि  भारत जैसे देश में जहाँ  अभिव्यक्ति की इतनी अधिक आजादी है, वहां पर इसका कितना अधिक दुरूपयोग किया जा रहा है. क्या किसी अन्य देश में इस तरह की नारेबाजी की जा सकती है ? सरकार के इस निर्णय पर कि  केंद्रीय विश्वविद्यालयों के  कैंपस में राष्ट्रीय ध्वजा रोहण किया जाएगा, कई  राजनीतिक दलों के नेता इसके विरोध में आ गए हैं. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज फहराना इन विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर असर डालेगा. आज ज्यादा तर टी वी चैनलों पर आप  देख सकते हैं कि  एक अभियान चल रहा है और कई  चैनल्स इन राष्ट्र विरोधी तत्वो के साथ खड़े हैं . 
  
JNU, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय है  या जिन्ना विश्वविद्यालय ? पुलिस गेट पर खड़ी है और विश्वविद्यालय के कुलपति उसे अंदर आने की अनुमति नहीं दे रहे. वे  छात्र जिन्होंने भारत विरोधी नारे लगाए थे, वह कैंपस में घूम रहे हैं, सभाएं  कर रहे हैं और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं. वेवस पुलिस  छात्रों के  स्वयं ही सरेंडर करने का इंतजार कर रही है.  क्या ऐसे कुलपति को किसी विश्वविद्यालय के कुलपति बने रहने का अधिकार है ?  जादवपुर विश्वविद्यालय में एक कुलपति है, उन्होंने भी विश्वविद्यालय के अंतर्गत राष्ट्र विरोधी नारे लगाने, अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगाने, याकूब मेमन की फांसी के विरोध में नारे लगाने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने से इंकार कर दिया . उन्होंने कहा कि इस तरह की कोई शिकायत उनके संज्ञान में नहीं आई है, और जो हो गया सो हो गया आगे से कोशिश की जाएगी कि ऐसा न हो. ये क्या बात हुई ? यह कुलपति है या किसी विशेष मिशन के लिए रखे गए राजनीतिक दल के कार्यकर्ता . हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी के सर्वे सर्वा इन छात्रों के समर्थन में है, और वह हर जगह बयान दे रहे हैं कि छात्रों का शोषण  किया जा रहा है. उन नेता को समझ नहीं है .... ये पूरा हिंदुस्तान समझता है. आज शहीद होने वाले सेना के जवानों के लिए कोई बात करने के लिए तैयार नहीं है लेकिन उन छात्रों के पक्ष में हवा बनायी जा रही है, जिन के खिलाफ सरकार ने मामले दर्ज किए हैं . उन वकीलों को जिन्होंने कन्हैया पर कोर्ट हमले का प्रयास किया था, ऐसे उदृत किया  जा रहा है जैसे इन वकीलों की हरकत देश द्रोहियों से  भी कहीं खराब  है. उनको भी देशद्रोही का दर्जा दिया जा रहा है और इसी ग्राउंड पर न्याय  पालिका की अवमानना को  बड़ी जोर शोर से उठाया जा रहा है. इन दोनों की तुलना की जा रही है कि मैं कौन ज्यादा देश्द्रोही  है .

संदेश साफ है जहां पर लोगों का नैतिक पतन इस हद तक हो  जाय कि वे अपने व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थ के लिए देश विरोधी गतिविधियों पर उतर आए और उन  के साथ खड़े हो जाएं हो देश द्रोही हो और देश के विरुद्ध युद्ध चला रहें है. ऐसे देश और ऐसे लोकतंत्र, का भगवान ही मालिक है .

Monday, 22 February 2016

हिंदुस्तान जवानों के साथ ....? या राष्ट्र द्रोहियों के साथ ..?


 आज जम्मू कश्मीर के एक आतंकवादी अभियान में सेना के 2 अधिकारियों सहित कुल 5 जवान शहीद हो गए. इसका कारण क्या है ? आतंकवाद के विरुद्ध बात नहीं हो रही है. बात चल रही है  तो जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के उन  छात्रों की जिन्हीने  भारत की बर्बादी तक जंग लड़ने की बात कही थी ....और जम्मू कश्मीर की आजादी तक जंग की  बात की  थी . वे छात्र  अभी तक पकड़े नहीं जा सके हैं . कई राजनीतिक दलों के लोग उनका साथ दे रहे हैं . इन राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के साथ खड़े हुए हैं. इनका मकसद क्या है ? इसका मतलब क्या है ? पहली बार  केंद्र में ऐसी सरकार है जो चाहे और जो भी न कर पा रही हो पर बहुसंख्यक वर्ग और देशभक्त लोगो में आशा का संचार कर रही है. जिससे पाकिस्तान समर्थक और देश के विरुद्ध काम करने कई गैर सरकारी संगठन सर्कार के विरुद्ध खड़े हो गए है. कभी अवार्ड वापसी, कभी असहिष्णुता, कभी FTII आन्दोलन, कभी IIT मद्रास, कभी हैदराबाद विश्वविद्यालय तो कभी JNU जैसी घटनाओं द्वारा न केवल सरकार  के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं बल्कि ये देश का बेडा गर्क कर रहे हैं .
 क्या इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ मोदी का विरोध करना और उनके विरुद्ध एक संयुक्त प्लेटफार्म खड़ा करना है ? ताकि आगे आने वाले चुनावों में  एक बेहतर विकल्प साबित कर सके और अल्पसंख्यकों के बोट  भी पा  सकें . कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि  भारत जैसे देश में जहाँ  अभिव्यक्ति की इतनी अधिक आजादी है, वहां पर इसका कितना अधिक दुरूपयोग किया जा रहा है. क्या किसी अन्य देश में इस तरह की नारेबाजी की जा सकती है ? सरकार के इस निर्णय पर कि  केंद्रीय विश्वविद्यालयों के  कैंपस में राष्ट्रीय ध्वजा रोहण किया जाएगा, कई  राजनीतिक दलों के नेता इसके विरोध में आ गए हैं. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज फहराना इन विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर असर डालेगा. आज ज्यादा तर टी वी चैनलों पर आप  देख सकते हैं कि  एक अभियान चल रहा है और कई  चैनल्स इन राष्ट्र विरोधी तत्वो के साथ खड़े हैं .   
JNU, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय है  या जिन्ना विश्वविद्यालय ? पुलिस गेट पर खड़ी है और विश्वविद्यालय के कुलपति उसे अंदर आने की अनुमति नहीं दे रहे. वे  छात्र जिन्होंने भारत विरोधी नारे लगाए थे, वह कैंपस में घूम रहे हैं, सभाएं  कर रहे हैं और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं. वेवस पुलिस  छात्रों के  स्वयं ही सरेंडर करने का इंतजार कर रही है.  क्या ऐसे कुलपति को किसी विश्वविद्यालय के कुलपति बने रहने का अधिकार है ?  जादवपुर विश्वविद्यालय में एक कुलपति है, उन्होंने भी विश्वविद्यालय के अंतर्गत राष्ट्र विरोधी नारे लगाने, अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगाने, याकूब मेमन की फांसी के विरोध में नारे लगाने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने से इंकार कर दिया . उन्होंने कहा कि इस तरह की कोई शिकायत उनके संज्ञान में नहीं आई है, और जो हो गया सो हो गया आगे से कोशिश की जाएगी कि ऐसा न हो. ये क्या बात हुई ? यह कुलपति है या किसी विशेष मिशन के लिए रखे गए राजनीतिक दल के कार्यकर्ता . हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी के सर्वे सर्वा इन छात्रों के समर्थन में है, और वह हर जगह बयान दे रहे हैं कि छात्रों का शोषण  किया जा रहा है. उन नेता को समझ नहीं है .... ये पूरा हिंदुस्तान समझता है. आज शहीद होने वाले सेना के जवानों के लिए कोई बात करने के लिए तैयार नहीं है लेकिन उन छात्रों के पक्ष में हवा बनायी जा रही है, जिन के खिलाफ सरकार ने मामले दर्ज किए हैं . उन वकीलों को जिन्होंने कन्हैया पर कोर्ट हमले का प्रयास किया था, ऐसे उदृत किया  जा रहा है जैसे इन वकीलों की हरकत देश द्रोहियों से  भी कहीं खराब  है. उनको भी देशद्रोही का दर्जा दिया जा रहा है और इसी ग्राउंड पर न्याय  पालिका की अवमानना को  बड़ी जोर शोर से उठाया जा रहा है. इन दोनों की तुलना की जा रही है कि मैं कौन ज्यादा देश्द्रोही  है .
संदेश साफ है जहां पर लोगों का नैतिक पतन इस हद तक हो  जाय कि वे अपने व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थ के लिए देश विरोधी गतिविधियों पर उतर आए और उन  के साथ खड़े हो जाएं हो देश द्रोही हो और देश के विरुद्ध युद्ध चला रहें है. ऐसे देश और ऐसे लोकतंत्र, का भगवान ही मालिक है .



Tuesday, 24 November 2015

आमिर भी दंगल में........... या दलदल में ........



एक सम्मान समारोह में आमिर खान ने कुछ ऐसा बयान दे दिया जिसे उनके प्रशंसक सकते में हैं.  कुछ प्रश्नों के जबाब में उन्होंने कहा कि  देश में डर और असुरक्षा का माहौल है और उनकी पत्नी ने  कुछ समय पहले उनसे हिंदुस्तान छोड़ने के लिए उनसे कहा था, क्यों कि वह अपने बच्चों के लिए बहुत चिंतित है. उन्होंने कहा कि पिछले  सात आठ महीने से ऐसा हुआ है, पता नहीं इसके पीछे कौन है ? स्वाभाविक है इस बयान से भूचाल आना ही था.


कुछ फिल्मो में बेहतरीन अदाकारी के कारण मैं आमिर खान का बहुत बड़ा फैन हूँ और देश के पर्यटन के ब्रांड एंबेसडर होने के कारण, जिसमे वह देश की इज्जत, मान- मर्यादा की बात करते हैं उनके प्रति  मेरा  सम्मान  और बढ़ गया था  लेकिन अनायास मुझे ऐसा क्यों लगने लगा  है कि मैं ठगा गया हूँ ? आमिर में जो मैंने देखा सुना वह सिर्फ ...... एक नाटक था और वे अच्छे कलाकार तो हैं लेकिन अच्छे इंसान नहीं. थ्री इडियट के, एक  इडियट वे नहीं, मैं हूँ और वे सारे लोग है जो उनके प्रसंशक हैं . अफ़सोस ... मैं उनकों क्या समझता था और वे क्या निकले. क्या एक कलाकार  जिसने तमाम ऐसे  किरदार निभाये हों  जिसमें जाति-पात धर्म  और संप्रदाय से  ऊपर उठकर काम करने की शिक्षा दी  हो, देश का  गौरव बढ़ाने की बात की हो और वह  लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बाद भी सिर्फ एक .... मुसलमान बन कर रह जाय, ....ये करोडों लोगो के दिल दुखाने की बात है. बड़े दिखने वाले लोग अंदर से कितने छोटे होतें हैं, इसका पता ऐसे वक्त में ही चलता है. पता नहीं उनकी बात में कितनी  सच्चाई है किन्तु  आमिर जैसा कोई व्यक्ति (या मुसलमान) जो इतना बड़ा व्यक्ति हो, पैसे वाला हो, इतना बड़ा स्टार हो, अगर वह अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं, तो  स्वाभाविक कि आम  मुसलमान क्या सोचेगा ? और उसका क्या हाल होगा ?  


आमिर खान ने अपने  इस बयान से देश का, समाज का और विशेष कर मुसलमानों का कितना अहित किया है, शायद इसका अंदाजा उन्हें नहीं है.  हर समाज में हर कौम में कुछ न कुछ तत्व मुख्यधारा से अलग होते हैं.  तमाम प्रयासों के वावजूद फैक्ट्री में भी तो कुछ डिफेक्टेड आइटम बन जाते हैं. हिन्दू समाज के ऐसे सिरफिरे लोगों की कुछ बातों को लेकर, जो बिलकुल भी नयी नहीं है हर शासनकाल में ऐसी बातें होती रहीं हैं, एक सुनियोजित अभियान चलाना, समझ से बाहर है.   हिन्दू समाज से ही नहीं किसी समाज से आदर्श की अपेक्षा करना बेमानी है. अगर आप राम जैसे भाई की कल्पना करते है, तो लक्ष्मण बनना सीखना होगा. आमिर का  बयान पूरे हिन्दू समाज के मुहँ पर एक तमाचा है.  इतने वर्षों तक मुझे कभी हिन्दू और मुसलमानों का अंतर समझ में नहीं आया आज उम्र के इस पड़ाव पर जैसे मुझे झकझोरा जा रहा कि मैं  हिन्दू हूँ ...मै  हिन्दू हूँ ....और मैं सोच रहा हूँ कि मैंने क्या गलती की ? हिंदुस्तान में मोदी सरकार बनने के बाद एक बड़ा वर्ग  जहां जोश और जश्न के मूड में था वही एक बड़ा वर्ग सदमे में था. इसमें ज्यादातर कांग्रेसी और बामपंथी विचारधारा से जुड़े ऐसे लोग भी थे, जिन्हें कालांतर में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के का डर दिखाकर उन के विरुद्ध खडा कर  दिया गया था. कई दशक बाद पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार बहुतों के लिए अप्रत्याशित थी.. और बहुतों के लिए आज भी असहनीय है. मेरा और मेरे जैसे बहुत लोगों का मत बनता जा रहा है कि मोदी जरूर कुछ न कुछ अच्छा  कर रहे होंगे तभी तो उनका इतना विरोध किया जा रहा है यहाँ तक उनकी पार्टी के ही बहुत से लोग विरोध के स्वर दे रहें हैं. कई पार्टियों के लोग पाकिस्तान और आई एस आई से मोदी को  हटाने की गुहार लगा रहें हैं.  कई  संस्थान, राजनैतिक दल और देश  मिलकर ऐसी कूट रचनाएँ कर रहें हैं जिससे  सरकार को बदनाम किया जाय और ऐसा  करने में  वे चाहे अनचाहे हिन्दुस्तान को भी बदनाम कर रहे हैं ये उचित नहीं है.
आज जब तथा कथित बड़ी बड़ी हस्तियाँ देश को बदनाम करने की मुहिम में लग गयी हैं, हम सामान्य जनो को चाहिए कि वे देश हित में आगे आयें और ऐसे सुन्योजित अभियानों का पर्दाफास करे. जय हिन्द .                     

                      *********************************** शिव प्रकाशमिश्रा
  

Friday, 20 November 2015

बिहार में बहार


श्री नीतीश कुमार द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ  ग्रहण करने के साथ बिहार में बहार आ गई. जेडीयू द्वारा बीजेपी  से संबद्ध संबंध विच्छेद करने के बाद बिहार में बहुत ही असमंजस पैदा हो गया था और लगातार अनिश्चय  की स्थिति बनी हुयी थी. चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव पूर्व सर्वेक्षण, मतदान से लेकर इक्सिट पोल और  अंतिम मतगणना तक लगातार सस्पेंस  बरकरार रहा. जो  चुनाव परिणाम सामने हैं,  उनमे एक  संदेश है जो आसानी से नहीं समझा जा सकता है . ऊपर से देखा जाए तो यह महा गठबंधन की महाविजय है और बीजेपी की जबरदस्त हार है. पर चुनाव परिणाम की विस्तृत विवेचना से पता चलता है की बिहार में सिर्फ और सिर्फ लालू प्रसाद यादव की ही जीत हुई है और बाकी सभी हार गए. चाहे वह मुख्यमंत्री बनने वाले नितीश कुमार हों, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों  या फिर अध्यादेश फाड़ने  वाले राहुल गांधी हो.

पूर्व विधानसभा में नितीश कुमार के 112 विधायक थे और बीजेपी  के 94 , ( दोनों पार्टियों के गठबंधन के पास कुल २०६ विधायक थे, आज महा गठबंधन के पास १७८ सीट हैं ), आरजेडी के पास २२ और कांग्रेस के पास ४ विधायक थे . नयी विधान सभा में  तमाम सुशासन और अच्छी छवि के बावजूद नितीश की जेडीयू को ७१ सीट  प्राप्त हुयी जो पहले से ४१ कम हैं. बीजेपी को ५३ सीट मिली हैं जो भी  पहले से ४१ कम हैं. अत: दोनों ही पराजित हुए हैं. आरजेडी को ८० सीटें  और वह विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी (पहले से ५८ ज्यादा) और नीतीश कुमार की पार्टी विधानसभा में नंबर 2 की पार्टी होगी और भारतीय जनता पार्टी नंबर 3 पर चली गई है ( दोनों ही एक एक पायदान नीचे ). मगर किसी को सबसे अधिक नुकसान हुआ तो वह हैं नितीश कुमार है जो पहले प्रधान मंत्री मैटीरियल थे अब मुख्यमंत्री मैटीरियल बने रहने के लिए लालू प्रसाद यादव की कृपा पर निर्भर हैं. सही मायने में बिना लालू प्रसाद यादव के, वह पत्ता भी नहीं हिला सकते.

 आज के शपथ ग्रहण समारोह से जिसमें लालू के बेटे को मुख्यमंत्री बनाया गया है, इस साबित हो गया है नीतीश कुमार की आगे की राह बहुत आसान नहीं है. तकनीकी तौर पर देखा जाए तो विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी  को मुख्यमंत्री पद  मिलना चाहिए था लेकिन लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद देकर उन पर बहुत बड़ा एहसान किया है. नीतीश कुमार इन अहसानों के तले दबे हुए काम करेंगे . उनके पास इतनी शक्ति और सामर्थ्य भी नहीं होगी कि  अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसे रोक सके और सुशासन कायम कर सकें.  इस बीच  लालू के दोनों बेटों को ट्रेनिंग मिलेगी और सत्ता में आगे बढ़ने का हौसला मिलेगा और यह उपमुख्यमंत्री अगले 1 या 2 साल बाद मुख्यमंत्री की दावेदारी कर सकता है  और हो भी सकता है. लालू यादव के पास 80 कांग्रेस के पास 27 मिलाकर बिना नितीश के सरकार बनाने के लिए सोलह विधायकों की जरूरत है और यह काम बड़े आराम से लालू यादव कर सकते हैं . ऐसा भी हो सकता है कि भारत के अगले  आम चुनाव 2019 में नितीश को विपक्ष के प्रधानमंत्री के  चेहरे के रुप में प्रस्तुत किया जाय . इस तरह से लालू यादव का काम आसान हो जाएगा. 

कहते है कि लोकतंत्र में जनता को वही सरकार मिलती है जिसकी वह हकदार होती है, शायद बिहार में यही हुआ है.एक और नयी चीज बिहार चुनाव परिणामों से निकल कर आयी है कि तमाम राजनैतिक दल और  तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल जितना महागठबंधन की जीत से खुश नहीं हैं उतने भाजपा की हार से खुश हैं।  सबसे महत्त्वपूर्ण ऐसे बहुत  लोग भाजपा में भी हैं।   

                            
                              *******************************