Thursday, 1 December 2016

Cashless Economy Vs Shameless Politics


कैशलेस इकोनोमी सिर्फ एक अवधारणा है, वास्तव में ऐसा अभी तक विश्व में ऐसा कहीं भी संभव नहीं हो सका है और शायद यह संभव हो भी नहीं सकेगा. इसलिए हमेशा प्रयास  होते है “लेस कैश इकोनोमी (Less Cash Economy)”  के शायद वह भारत में वर्तमान नोट बंदी से काफी हद तक संभव हो सकेगा. नंदन नील्करनी ने हाल में ही कहा था कि इ-पेमेंट की दिशा में जिस काम को करने में ६ साल लगते वह अब ६ महीने में हो जायेगा. ऐसा हो रहा है बहुत तेजी से कम से कम शहरों में तो ही रहा है. इसके दूरगामी परिणाम होंगे और तुरंत न सही लेकिन इससे लेस कैश इकोनोमी बनने की गति तेज होगी. जो भी हो, ये सही कि अचानक लिए गए नोट बंदी के  निर्णय से जनता को परेशानी हो  रही है लेकिन ये भी सही है कि जनता सरकार के  इस अटपटे से दिखने वाले कार्य सामान्यतया खुश दिख रही है.


विपक्षी दलों ने नोट बंदी के इस फैसले को विरोध का बहुत गंभीर मुद्दा बनाया हुआ है और संसद से सड़क तक विरोध कर रहे हैं. इसका परिणाम ये हो रहा है कि धीरे धीरे जनता भी इन परेशानियों को  मानसिक रूप से वास्तविकता से कहीं अधिक समझाने लगी है. योजना लागू करने में कमिया हो सकती हैं और हैं भी लेकिन क्या विरोध का तरीका इतना सतही होना चाहिए कि जो विपक्षी दल भारत बांध में शामिल न हों उन्हें गद्दार कहा जाय. 

हद तो तब हो गयी जब ममता बनेर्जी ने सेना के नियमित कार्ययोजनाओं को पशिम बंगाल में सैन्य विद्रोह की संज्ञा दी और कहा कि सेना लूट कर रही है. पता नहीं वे पश्चिम बंगाल को एक देश समझती है और खुद को वहां की महारानी. आखिर राज्य में सैन्य विद्रोह की क्या जरूरत ? किसी मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने के लिए तो राज्यपाल ही काफी है. सबसे हास्यापद बात तो ये कि उन्होंने आरोप लगाया कि ममता  के प्लेन को कलकत्ता में उतरने में देर की गयी और इससे उनकी जान को खतरा हो सकता था. हर बड़े एअर पोर्ट पर व्यस्त समय में विमान को आसमान में इन्तजार करना पड़ता है और ये समय १५ से ३० मिनट का हो सकता है. मै  स्वयं भी कल मुम्बई एअरपोर्ट पर रात  १० बजे जेट की उड़ान में था जिसे आसमान में लग्न्हाग २० मिनट इन्तजार करना पड़ा.  इंडिगो के  विमान जिसमें ममता जी थीं उनके अतरिक्त लगभग १०० अन्य यात्री थे. क्या ममता की जान पर  ख़तरा करने के लिए १०० अन्य यात्रियों की जान केंद्र सरकार के इशारे पर ली  जा सकती है ? पता नहीं राजनैतिक गिरावट की अंतिम सीमा क्या होगी ?
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शिव प्रकाश मिश्रा 
http://lucknowtribune.blogspot.in


Friday, 13 May 2016

बिहार का आगाज ........ क्या सचमुच आ गया आ गया जंगलराज....?



बारहवीं क्लास में पढ़ने वाले एक 19 वर्षीय छात्र आदित्य सचदेवा की बिहार में हत्या इसलिए की गयी क्योंकि उसने माफिया डॉन बिंदी यादव और सत्तारुढ़ दल की विधान परिषद सदस्य मनोरमा देवी के बेटे रॉकी यादव की कार को ओवरटेक करने की गुस्ताखी  की थी, जो अछम्य थी. शायद लोग सही कहते थे “ओवरटेक न करना बिहार में वरना गोली पड़ेगी कपार में ” इस घटना के बाद मेंरे एक मित्र ने अपनी मारुति कार  के पीछे लिख लिया है “जगह मिलने पर तुरन्त पास दिया जायेगा, कृपया गोली न मारें ”  आदित्य सचदेवा के परिजनों का करुण क्रंदन दिल को दहला देने वाला है और इसने  जन आक्रोश को जन्म दिया है किंतु सत्तारूढ़ दल इसे समझ नहीं सका है और, उप मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री सहित इसके  नेता  अनाप-शनाप और अनावश्यक बयान दे  रहे हैं जिससे न केवल सरकार की बल्कि समूचे बिहार की छवि खराब हो रही है और लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि  शायद जंगलराज का आगाज हो रहा है.  हो सकता है इसमें थोड़ी अतिश्योक्ति हो या राजनातिक विद्वेष की भावना हो. किन्तु  सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा खासतौर से उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और वाज जले पर नमक छिड़कने जैसा है . यह सत्ता का अहंकार है और यह अंग्रेजों के जमाने की  उस मानसिकता से भी खराब है जिसमें भारतीय अंग्रेजों के बराबर खड़े नहीं हो सकते थे अंग्रेजों के साथ ट्रेन में यात्रा नहीं कर सकते थे और  सड़कों पर चल नहीं  सकते थे.

बिहार की वर्तमान सरकार में लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी पार्टी है और इसके पास 80 विधायक हैं नीतीश कुमार जो मुख्यमंत्री हैं उनके पास केवल ७१  विधायक हैं और उनकी पार्टी दूसरे नंबर की पार्टी है. किसी भी गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी का प्रतिनिधि सरकार का मुखिया होता है किंतु चुनाव से पहले लालू यादव ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी पार्टी 80 सीटें प्राप्त कर बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनेगी.  शायद इसीलिए उन्होंने नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता मानकर चुनाव प्रचार किया था और सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे और उन्होंने ऐसा  किया भी.  लेकिन चुनाव के बाद  दोनों पार्टियों में एक अंदुरुनी सहमत बन गई थी कि जब तक लालू यादव का  बच्चा लोग ट्रेनिंग करेंगे तब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे और जैसे ही बच्चा लोगों की ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी, नीतीश कुमार बड़े गठबंधन के  मुखिया बनकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करेंगे. लालू प्रसाद यादव उन्हें समर्थन देंगे. हालाकि नितीश ने अपने लिए पार्टी के अध्यक्ष का पद पहले से ही शरद यादव से लेकर अपने पास रख लिया है . आप देखेंगे कि इस प्रकरण में अचानक उप मुख्यमंत्री और लालू के बेटे तेजस्वी यादव की भूमिका बहुत महत्व पूर्ण हो गयी है. उन्होंने सामने आकर कई बयान दिए और यह जताने की कोशिश की इस सरकार में दबदबा किस पार्टी का है इस पूरे प्रकरण में नितीश कुमार नेपथ्य में चले गए और बताया गया कि वह वाराणसी में, जो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र है वहां पर कोई रैली को संबोधित कर रहे हैं. हो सकता है किसी नैतिक आधार का सहारा लेकर स्तीफा भी दे दे लेकिन फिर सुशासन का क्या होगा ....?
शिव प्रकाश मिश्रा
लखनऊ ट्रिब्यून  http://lucknowtribune.blogspot.in ,
लखनऊ सेन्ट्रल  http://lucknowcentral.blogspot.in  तथा

हम हिन्दुस्तानी http://mishrasp.blogspot.in में एकसाथ प्रकाशित 

Friday, 15 April 2016

शाहरुख का फिर ऊल जलूल बयान


फिल्म स्टार शाहरुख खान ने इंडिया टीवी के प्रोग्राम जनता की अदालत”   के एक प्रोग्राम में, जिसका प्रसारण कल शनिवार को किया  जाना है,  रजत शर्मा के सवालों का जवाब देते हुए अपने पिछले असहिष्णुता के बयान पर बहुत सफाई दी. ये  कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि यह सफाई उनकी आगामी फिल्म फेनके रिलीज होने के उपलक्ष में की गई है. अपने परिवार के देशभक्त होने के दावे को मजबूत करते हुए और  अपनी स्थिति  साफ करते  करते उन्होंने एक बहुत लंबा, बेतुका और हास्यापद दावा कर दिया कि उनसे बड़ा देशभक्त हिंदुस्तान में कोई नहीं है.

हिंदुस्तान का सबसे बड़ा देशभक्त  होने का दावा इतना मूर्खतापूर्ण है के इससे उनकी मानसिक स्थित का पता चलता है. अपने दावे से उन्होंने  125 करोड़ की जनसंख्या वाले  हिंदुस्तान में सबको अपने से छोटा कर दिया. इससे कम से कम इतना  संदेह तो  हो ही गया कि वे पूरे देशभक्त तो नहीं हैं या फिर उनमे बुदधि  और विवेक की काफी कमी है . इससे ये भी सिद्ध होता है कि परदे का हीरो असल जिन्दगी में जीरो भी हो सकता है.

 एक बहुत सामान्य जानकारी का व्यक्ति भी बहुत आसानी से  समझ सकता है कि उनके बयान में कितना अहंकार है और शायद इसी अहंकार की वजह से पिछली बार  दर्शकों ने उनका मानमर्दन किया था. सोशल मीडिया पर उनकी बहुत भद्द  हुई थी. लोगों ने उनकी फिल्मों का बायकाट करना शुरू किया था और इसका बहुत नुकसान  उनको भुगतना पड़ा था. इसके लिए उन्होंने पूरी जनता से माफी भी मांगी थी लेकिन फिर भी अपनी आगामी फिल्म को ध्यान में रखते हुए नुकसान की भरपाई को पूरा करने के लिए जानबूझ कर सफाई दी. और तो और इंडिया टीवी के रजत शर्मा ने आज दिनांक १५ अप्रैल को शो टेलीकास्ट होने के एक दिन पहले ही इस प्रोग्राम के चुनिन्दा अंश  प्राइम टाइम के प्रोग्राम आज की बात जो मूलत: समाचारों का कार्यक्रम हैमें विस्तार से दिखाए. प्रोग्राम के शुरू के १० मिनट में सिर्फ शाहरुख़ खान की शहनाई बजाई गयी. कल १६ अप्रैल को शाहरुख़ की फिल्म रिलीज हो रही है और आज का ये प्रचार  सयोंग नहीं हो सकता. हालाकि शाहरुख़ खान विभिन्न चैनलों पर और विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में जाते रहे हैं.

ईश्वर ऐसे सभी लोगो को सद्बुद्धि दे जिससे वह सच्चे देशभक्त बनने का प्रयाश कर सकें.
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                              -शिव प्रकाश मिश्र

Tuesday, 8 March 2016

और.... अब.... श्री श्री की बारी



श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ़ लिविंग द्वारा आयोजित विश्व सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन 11 मार्च से 13 मार्च तक दिल्ली में पूर्वी यमुना किनारे किया जा रहा है. इसका आयोजन आर्ट ऑफ लिविंग के 35 वर्ष पूरे होने उपलक्ष में किया जा रहा है और वास्तव में आर्ट ऑफ लिविंग और इसके अनुयायियों के लिए उत्सव  जैसा है . आर्ट ऑफ लिविंग, लोगों को शांत और खुश होकर जीने की कला सिखाता है, तनाव को दूर करता है, और  व्यक्ति खुशहाल रह सकता है. चूँकि  इन सबसे व्यक्ति की  उत्पादकता भी बढती  है इसलिए लगभग  सभी बड़े कॉर्पोरेट  अपने कर्मचारियों को आर्ट ऑफ लिविंग के कोर्स कराते है. स्वाभाविक है आर्ट ऑफ लिविंग के अनुयायियों की एक बहुत बड़ी संख्या है. विश्व के लगभग हर बड़े शहर में आर्ट ऑफ़ लिविंग के आयोजन हए हैं.  हिंदुस्तान का एक बहुत बड़ा समूह आर्ट ऑफ लिविंग से प्रशिक्षित और प्रभावित है. अब जब  आयोजन का समय बहुत नजदीक आ गया है, कुछ पर्यावरण विद और संस्थाएं इस आयोजन के विरोध में खड़े हो गए हैं. मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में  चल रहा है. आज भी इसकी सुनवाई होगी. पक्ष और विपक्ष में दलीलें होगी लेकिन अहम् प्रश्न  है कि क्या यह आयोजन हो सकेगा ?

इस आयोजन का उद्देश चाहे जो भी हो लेकिन कम से कम राष्ट्र और मानवता के विरुद्ध तो नहीं हो सकता. इस आयोजन में कई देशों के कलाकार भाग लेंगे और भारत के विभिन्न राज्यों की संस्कृतियों प्रस्तुत करने के अलावा विभिन्न समुदायों और  विभिन्न धर्मों के लोग मिलेंगे बैठेंगे और विश्व शांति के लिए रास्ता खोजेंगे. कुल मिलाकर देखा जाए तो यह ऐसा दुर्लभ आयोजन है जो भारत भूमि पर होगा और भारतवासियों को उपलब्ध होगा. हम शामिल हो पाएं या नहीं पर टीवी चैनलों के माध्यम से  कम-से-कम सभी भारतवासियों को  इस का लाभ मिल सकता  हैं. आजकल भारत में प्रचलन  हो गया है हर अच्छे काम का विरोध करना. और उस के पक्ष विपक्ष में पूरे हिंदुस्तान को बांटने की कोशिश करना. गनीमत यह है कि यह मामला सिर्फ पर्यावरण से जोड़ा गया है इसमें  धार्मिक मानसिकता का समावेश नहीं किया गया है . यह अच्छी बात है कि पर्यावरण के लिए पूरा विश्व सजग  है और हम भी उस में सहयोग कर रहे हैं लेकिन कुछ पर्यावरण विद और  उनके कार्यकर्ता ऐसा काम करते हैं जिससे जनमानस के बहुत बड़े वर्ग में कसमसाहट होती है. सभी जानते हैं पर्यावरण विश्व की समस्या है और बहुत बड़ी समस्या है लेकिन इस समस्या को खड़ा करने में कम-से-कम भारत का बहुत बड़ा योगदान नहीं है क्योंकि जो कार्य विकसित देशो ने कम समय में कर दिया है वह  भारत कम-से-कम अगले 50 साल में भी नहीं कर सकता है. हमें देखना होगा कि इस तरह के आयोजन से पर्यावरण का कैसा और कितना नुकसान हो जाता है और जिस प्रकार के तर्क और कुतर्क इस आयोजन के विरोध में दिये  जा रहे हैं साधारण जनमानस को समझ में नहीं आ सकते . अमेरिका सहित  विश्व के किसी भी देश में अगर इस तरह का आयोजन होता तो उस देश के लिए गौरव की बात होती लेकिन हिंदुस्तान में हम लोग अभ्यस्त हो गए है कि  हर अच्छे काम का विरोध होता है. यहां तक  बड़े तीज त्योहारों का भी विरोध होता है दिवाली पर पटाखे ना छोड़ने की अपील होती है. कितने शक्ति के पटाखे चलाए जाएं निर्णय किये जाते हैं इस पर रोक लगाई जाती है. होली पर  पानी कितने समय उपलब्ध हो यह निश्चित किया जाता है. होली जलाने में लकड़ी और आदि का जो प्रयोग किया जाता है इस पर भी तमाम विरोध होता  है  पर्यावरण  के नाम पर. बहुत बड़े यज्ञ और हवन के  विरोध में भी  आवाजे आती  हैं.

शायद सभी जानते है भारत की जीवन पद्धति आद्र पद्धति है और आदिकाल से सभी आयोजन नदियों, जलाशयों और सरोवरों  के किनारे होते आये हैं . कुम्भ, अर्ध कुम्भ सहित तमाम  आयोजन नदियों के किनारे होते  है और करोड़ों की संख्या में लोग भाग लेते हैं. आज अगर इस तरह के आयोजन के विरुद्ध आवाज उठाई जा रही है तो कल कुंभ और अर्ध कुंभ के आयोजन पर भी प्रतिबंध प्रतिबंध लगाया जा सकता है. हो सकता है कि सरकारी औपचारिक्ताये पूरी  न हुयी हों पर भारत के एक बड़े वर्ग को इससे वंचित नहीं किया जाना  चाहिए.
आशा है ये आयोजन जरूर होगा . 
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शिव प्रकाश मिश्रा 

Friday, 4 March 2016

कन्हैया की रिहाई ....... बधाई ..उनके शुभ चिंतकों को

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संगठन के पदाधिकारी कन्हैया कुमार को कल दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रिहा कर दिया गया. हालाकि  दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में ऐसी  बहुत सारी  शर्तें हैं जिनसे JNU में जो कुछ हुआ उसके प्रति अच्छा सन्देश नहीं है. ये सर्व विदित है कि कैसे JNU  को राष्ट्र विरोधी तत्वो का अड्डा बनाया गया और कैसे वहां पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियां चलाई जाती है और कैसे वहां पर  देश के बहुत संख्यक समुदाय के प्रति कुत्सित भावनाएं निकाली जाती हैं . इन सब के पीछे एक सुनियोजित अभियान है और इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर  और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी धन उपलब्ध कराया जाता है. अंतरिम जमानत आदेश की शर्तों में कन्हैया कुमार को किसी भी देश विरोधी अभियान में शामिल ना होना, किसी भी ऐसी चीजों से अलग रहना  जिससे देश की छवि प्रभावित होती है, देश की अखंडता को धक्का पहुंचता है. लेकिन इस जमानत को एक बहुत बड़ी विजय के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है .

  रिहाई के बाद कन्हैया कुमार के लिए  JNU में उसी रात लगभग 11:00 बजे एक सभा का आयोजन किया गया जिसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लगभग हर चैनेल ने सीधे प्रसारित किया. जिन लोगों ने ये  सीधा प्रसारण देखा और कन्हैया कुमार द्वारा संबोधन और उस में कही गई बातों का सुना, उन लोगों को इस बात का एहसास जरूर हुआ होगा कि उसके बोलने की स्टाइल और डायलोग बहुत ही  अच्छे हैं, पूरा भाषण किसी मंझे  हुए राजनेता से कम नहीं था . भाषण को बहुत ही सावधानी  से लिखा गया था और मुख्य निशाना केंद्र व् सरकार नरेंद्र मोदी थे . यह कहना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि  पूरे भाषण में कन्हैया कुमार ने कई राजनीतिक दलों का और कई  नेताओं का नाम लेकर उनके प्रति आभार व्यक्त किया और प्रशंसा की जिन्होंने उनका साथ दिया. ये  दर्शाता है कि यह पटकथा कहीं और लिखी गयी . कन्हैया कुमार के अतीत को अगर देखा जाए तो ऐसा नहीं लगता कि वह किसी मंझे  हुए नेता की  तरह सधा  हुआ भाषण देने की कला जानते हैं.  और तो और, भाषण के अंत में उसी तरह की  नारेबाजी की गई.... आजादी.... आजादी जैसे कि उमर खालिद ने हिंदुस्तान से  आजादी की  बात की थी. शायद इसका उद्देश पूरे देश को संदेश देना होगा की उस दिन अफजल गुरु की बर्षी पर भी  इसी तरह के भाषण दिए गए थे  और जो भी वीडियो पुलिस के समक्ष प्रस्तुत किये गए या  मीडिया में दिखाए गए गए वह सही नहीं थे. यही काफी कुछ नियोजित लगता है.

कन्हैया कुमार की जेल के दौरान  उनके परिवारी जनो द्वारा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करना और कन्हैया ने  जो भी किया  उस पर गर्व किया . भाषण में तमाम लोगों पर नाम कटाक्ष किया गया और एलान किया गया कि आजादी की जंग चलती रहेगी. स्वाभाविक है आजादी की जंग का मतलब मोदी सरकार से आज़ादी. ये शुद्ध राजनीति है और इसलिए जो पूरा ड्रामा शुरु हुआ और उसे  जो मोड़ दिया गया वह आगामी चुनाओं को ध्यान में रखते हुए  किया गया है.


भारत में पिछले  कुछ महीनों में हुए आन्दोलनों पर  अगर सिलसिले बार गौर किया जाए तो आप पाएंगे कितना कुछ बिलकुल इवेंट मैनेजमेंट की तरह किया जा रहा है . फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया पुणे में छात्रों का प्रदर्शन होता है, कथित बौद्धिक लेखक वर्ग असहिष्णुता के नाम पर अपना पुरस्कार वापस करता है और तब  तक चलता रहता है जब तक बिहार के चुनाव संपन्न नहीं हो जाते,  इसी बीच में रोहित वेमिला का मामला आता है, बीफ का मामला गर्माता है . इसके बाद मैं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय का नंबर आता है और अफजल गुरु के फांसी के दिन को  शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, उसकी प्रशंसा की जाती है. अफजल गुरु के पक्ष में स्वयं  उमर खालिद और एक विशेष समुदाय संबंध रखने वाले कई नेता मीडिया बहस में अफजल गुरु और कई ऐसे लोगों के पक्ष में बयान देते हैं.

इस बात में किसी को भी कोई संदेह नहीं कि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में राष्ट्र विरोधी नारे लगाए गए . अखिलेश गुरु के समर्थन में नारे लगाए गए और बहुत से ऐसे नारे लगाए गए कि कोई भी राष्ट्र भक्त और राष्ट्र हित में सोचने वाला व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर सकता है. जब इस मामले को मीडिया में उछाल दिया गया तो तथाकथित बौद्धिक वर्ग सामने आ गया इसमें राजनैतिक दल भी थे और कई गणमान्य व्यक्ति भी. पूरे मामले को ऐसा मोड़ दे दिया गया जैसे की राष्ट्र और राष्ट्र विरोध की भावना ना होकर केंद्र सरकार और छात्र के बीच का मामला है. कन्हैया कुमार को जेल  ले जाते समय  धक्का मुक्की को उन वकीलों के लिए ऐसा पेश किया गया जैसे उनका कृत्य राष्ट्रद्रोह से भी भयंकर है. इस बीच उमर खालिद और उसके अन्य साथी  भूमिगत हो जाते हैं और जब पूरा माहौल उन के पक्ष में बन जाता है, कई राष्ट्रीय नेता और अंतरराष्ट्रीय हस्तियां  उन के पक्ष में खड़े हो जाते हैं तो अचानक प्रगट हो जाते हैं. दिल्ली सरकार जिसके पास पुलिस का कंट्रोल  नहीं है, कानून व्यवस्था का भी दायित्व  नहीं है,  मजिस्ट्रेट जांच का आदेश देती है और उस जांच में यह पाया जाता है कि जो वीडियो पुलिस को दिए गए और जिन वीडियो के आधार पर भी कार्रवाई की जा रही उनके साथ छेड़छाड़ की गयी थी. इन सबके बीच कई राजनीतिक दलों के नेता कैम्पस  जाते हैं और सभी छात्रों के समर्थन में खड़े हो जाते हैं . कई राज्यों के मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों से बयान देते हैं. अब कन्हैया बामपंथियो, कांग्रेस और आप के लिए चुनाव प्रचार करेंगे ...

विषय बहुत गंभीर है और इसको उतनी ही गंभीरता से हल करने की जरूरत है. देशद्रोहियों के साथ,  देश के विरुद्ध बात करने वालों के साथ, देशद्रोहियों का साथ देने वालों के साथ, बहुत ही सख्ती से पेश आने की जरूरत है लेकिन देश के पालनहार कर्णधार राजनैतिक  स्वार्थ बस .....देश हितो के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं . राजनीतिक स्वार्थ आज देश तो बहुत बड़ा हो गया है. पूरी दुनियां देख रही है .. भारत कैसा महान है ? और कितना महान है ?


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शिव प्रकाश मिश्रा 



Thursday, 3 March 2016

कर्मचारी भविष्य निधि .....आयकर.....या सजा ?

बजट में वित्त मंत्री द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि पर लगाए जाने वाला टेक्स साधारण टैक्स नहीं है यह कर्मचारियों के लिए जिन्होंने 30 - 35 साल की सेवा अवधि पूरी कर ली है और निकट भविष्य में सेवानिवृति होने वाले हैं, बहुत बड़ी सजा है. यह ज्यादातर कर्मचारियों की राय है.  भविष्य निधि एक  लंबी अवधि की संचय योजना है और उसका उद्देश्य सेवा निवृत्ति के समय एक मुस्त राशि प्रदान करना है ताकि वे अपनी जिम्मेदारियों का वहन कर सकें.  वित्त सचिव और वित्त  राज्य मंत्री के बयानों और स्पष्टीकरण से ऐसा मालूम हुआ है कि  संभवत: ब्याज की 60% भाग पर टैक्स लगेगा.

 टैक्स का प्रावधान  करने वाले केंद्र सरकार के उच्च अधिकारियों को शायद ये  नहीं मालूम है कि  सेवा मुक्त होने पर भविष्य निधि की राशि जो कर्मचारी को मिलती है उस में आधे से अधिक हिस्सा सिर्फ ब्याज का होता है और अगर ब्याज की 60% राशि पर भी टैक्स लगाया जाता है तो यह बहुत अधिक होगा लगभग. अगर कोई कर्मचारी पेंशन सिस्टम में निवेश करने की बजाय टैक्स देना पसंद करें, तो अनुमान है कि  वह व्यक्ति अपने भविष्य निधि का लगभग पांचवा (१८-२०%) हिस्सा सिर्फ टैक्स के रुप में गवां देगा . अगर यह पैसा  पेंशन योजना में  लगाया जाता है जो आज की परस्थितयों में  बहुत अच्छा सुझाव नहीं है, क्योंकि एक तो ज्यादातर योजनाएं भारत में बहुत आकर्षक लाभ नहीं दे रहीं  हैं और दूसरे इन  योजनाओं से निश्चित समय बाद जो पैसा निकालने दिया जाता है तो उन पर आयकर लगता है। 

 पेंशन योजना की  तुलना में अगर इस राशि को कहीं अन्यत्र निवेश किया जाता है तो उसके लाभ काफी जादा है. स्पष्ट है कि जो  कर्मचारी रिटायर होते हैं उनके पास भविष्य निधि के फंड के अलावा बहुत सीमित विकल्प होते हैं और खास तौर से ऐसे लोग जो अपनी जिम्मेदारियों के कारण अपने सेवाकाल में ऐसा कुछ नहीं कर पाते हैं जिसके  सपने उनके दिल में होते हैं. ये लोग सेवा मुक्त होने  के बाद ऐसा क्या करेंगे ? कार खरीदेंगे.. मकान खरीदेंगे...बच्चों की शादी विवाह करेंगे...  जमीन खरीदेंगे या जाकर गांव कस्बे या शहर  में बसेगे. उनके लिए यह प्रस्ताव बहुत ही मुसीबत देने वाले हैं . 

वास्तव में यह टैक्स नहीं... सजा है और सरकार को इस से बचना चाहिए . इस तरह का प्रावधान एक तो अनायास नहीं किया जा सकता और दूसरे ऐसे लोग अपने पूरे सेवाकाल में तमाम कठनाईयां सहने के बाद अपने भविष्य निधि को हाथ भी नहीं लगाया और भविष्य के लिए सुरक्षित रखा. मनोवैज्ञानिक रुप से भी एक अच्छा कारण सरकार के लिए नहीं है.. वित्त मंत्रालय से जुड़े तमाम अधिकारियों ने कहा है इस योजना का उद्देश भविष्य निधि पर टैक्स लगा कर  सरकार के लिए पैसे जुटाना नहीं है बल्कि सरकार चाहती है की लोगों को सामाजिक सुरक्षा मिले. अगर सरकार की यह बात स्वीकार भी की जाए तो भी इसे तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता. इस तरह की योजना अगर लागू करनी है तो नए कर्मचारियों के लिए लागू करनी चाहिए और जो कर्मचारी अगले कुछ सालों में रिटायर होने वाले हैं उन पर यह योजना थोपी नहीं जानी चाहिए.  इस तरह की योजनाएं बनाने वाले मुख्यता केंद्र सरकार के वह बड़े अधिकारी है जिनके पास अच्छी संपत्ति है और जिन्होंने देश विदेश घूमकर सामाजिक सुरक्षा की विभिन्न  योजनाएं देखी हैं जिनका भारत में काम करने वाले छोटे कर्मचारियों की रोजाना जिंदगी और समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है. ये  वह अधिकारी हैं जिनको इतनी पेंशन मिलती है जो शायद प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के निकायों में काम करने वाले बड़े अधिकारियों की सैलरी से भी ज्यादा होती है. स्वाभाविक है वह शायद इस योजना को समझ नहीं पाएंगे . 

अच्छा  होगा यदि सेवा मुक्त होने वाले कर्मचारी अपना पैसा कैसे इस्तेमाल करेंगे ? कहां लगाएंगे ? इसका फैसला उनके ऊपर छोड़ देना चाहिए. इस तरह की जो सोशल सिक्योरिटी की योजनाएं लागू की जानी  है वह कर्मचारियों के करियर की शुरुआत में लगाई जानी चाहिए. कम से कम भी सेवा मुक्त होने वाले कर्मचारियों पर यह चीजे नहीं थोपी  जानी चाहिए.  
इस प्रावधान को तुरंत वापस ले लेना चाहिए.


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               -  शिव प्रकाश मिश्रा 

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Tuesday, 23 February 2016

हिंदुस्तान जवानों के साथ ....? या राष्ट्र द्रोहियों के साथ ..?


आज जम्मू कश्मीर के एक आतंकवादी अभियान में सेना के 2 अधिकारियों सहित कुल 5 जवान शहीद हो गए. इसका कारण क्या है ? आतंकवाद के विरुद्ध बात नहीं हो रही है. बात चल रही है  तो जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के उन  छात्रों की जिन्हीने  भारत की बर्बादी तक जंग लड़ने की बात कही थी ....और जम्मू कश्मीर की आजादी तक जंग की  बात की  थी . वे छात्र  अभी तक पकड़े नहीं जा सके हैं . कई राजनीतिक दलों के लोग उनका साथ दे रहे हैं . इन राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के साथ खड़े हुए हैं. इनका मकसद क्या है ? इसका मतलब क्या है ? पहली बार  केंद्र में ऐसी सरकार है जो चाहे और जो भी न कर पा रही हो पर बहुसंख्यक वर्ग और देशभक्त लोगो में आशा का संचार कर रही है. जिससे पाकिस्तान समर्थक और देश के विरुद्ध काम करने कई गैर सरकारी संगठन सर्कार के विरुद्ध खड़े हो गए है. कभी अवार्ड वापसी, कभी असहिष्णुता, कभी FTII आन्दोलन, कभी IIT मद्रास, कभी हैदराबाद विश्वविद्यालय तो कभी JNU जैसी घटनाओं द्वारा न केवल सरकार  के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं बल्कि ये देश का बेडा गर्क कर रहे हैं .

 क्या इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ मोदी का विरोध करना और उनके विरुद्ध एक संयुक्त प्लेटफार्म खड़ा करना है ? ताकि आगे आने वाले चुनावों में  एक बेहतर विकल्प साबित कर सके और अल्पसंख्यकों के बोट  भी पा  सकें . कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि  भारत जैसे देश में जहाँ  अभिव्यक्ति की इतनी अधिक आजादी है, वहां पर इसका कितना अधिक दुरूपयोग किया जा रहा है. क्या किसी अन्य देश में इस तरह की नारेबाजी की जा सकती है ? सरकार के इस निर्णय पर कि  केंद्रीय विश्वविद्यालयों के  कैंपस में राष्ट्रीय ध्वजा रोहण किया जाएगा, कई  राजनीतिक दलों के नेता इसके विरोध में आ गए हैं. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज फहराना इन विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर असर डालेगा. आज ज्यादा तर टी वी चैनलों पर आप  देख सकते हैं कि  एक अभियान चल रहा है और कई  चैनल्स इन राष्ट्र विरोधी तत्वो के साथ खड़े हैं . 
  
JNU, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय है  या जिन्ना विश्वविद्यालय ? पुलिस गेट पर खड़ी है और विश्वविद्यालय के कुलपति उसे अंदर आने की अनुमति नहीं दे रहे. वे  छात्र जिन्होंने भारत विरोधी नारे लगाए थे, वह कैंपस में घूम रहे हैं, सभाएं  कर रहे हैं और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं. वेवस पुलिस  छात्रों के  स्वयं ही सरेंडर करने का इंतजार कर रही है.  क्या ऐसे कुलपति को किसी विश्वविद्यालय के कुलपति बने रहने का अधिकार है ?  जादवपुर विश्वविद्यालय में एक कुलपति है, उन्होंने भी विश्वविद्यालय के अंतर्गत राष्ट्र विरोधी नारे लगाने, अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगाने, याकूब मेमन की फांसी के विरोध में नारे लगाने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने से इंकार कर दिया . उन्होंने कहा कि इस तरह की कोई शिकायत उनके संज्ञान में नहीं आई है, और जो हो गया सो हो गया आगे से कोशिश की जाएगी कि ऐसा न हो. ये क्या बात हुई ? यह कुलपति है या किसी विशेष मिशन के लिए रखे गए राजनीतिक दल के कार्यकर्ता . हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी के सर्वे सर्वा इन छात्रों के समर्थन में है, और वह हर जगह बयान दे रहे हैं कि छात्रों का शोषण  किया जा रहा है. उन नेता को समझ नहीं है .... ये पूरा हिंदुस्तान समझता है. आज शहीद होने वाले सेना के जवानों के लिए कोई बात करने के लिए तैयार नहीं है लेकिन उन छात्रों के पक्ष में हवा बनायी जा रही है, जिन के खिलाफ सरकार ने मामले दर्ज किए हैं . उन वकीलों को जिन्होंने कन्हैया पर कोर्ट हमले का प्रयास किया था, ऐसे उदृत किया  जा रहा है जैसे इन वकीलों की हरकत देश द्रोहियों से  भी कहीं खराब  है. उनको भी देशद्रोही का दर्जा दिया जा रहा है और इसी ग्राउंड पर न्याय  पालिका की अवमानना को  बड़ी जोर शोर से उठाया जा रहा है. इन दोनों की तुलना की जा रही है कि मैं कौन ज्यादा देश्द्रोही  है .

संदेश साफ है जहां पर लोगों का नैतिक पतन इस हद तक हो  जाय कि वे अपने व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थ के लिए देश विरोधी गतिविधियों पर उतर आए और उन  के साथ खड़े हो जाएं हो देश द्रोही हो और देश के विरुद्ध युद्ध चला रहें है. ऐसे देश और ऐसे लोकतंत्र, का भगवान ही मालिक है .